अहसास ( कविता)
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मधुर अहसास तेरा,
बनेगा मेरा अवलंबन,
मैं रुठा रहूंगा,
तुम मनाओगी प्रतिपल/
मस्त यौवन कुम्हलाएगा,
गुले- रुख्सार शरमाएगा ,
बाँकी चितवन चितवेगी बार- बार,
मैं तुम्हें यूँ ही तड़पाऊँगा/
मेरा प्याला खाली रहेगा,
मैं तुम्हें न बुलाऊँगा,
तुम करोगी मनुहार,
मैं नया ढ़ोंग रचाऊँगा/
लहरेंगे तुम्हारे कुन्तल,
रहेंगी उनींदी तुम्हारी आँखे,
मैं दूर- दूर हटूँगा,
तुम गले में डालोगी बाहें,
शरमाने की आदत पुरानी है,
क्या हुआ भले आज जवानी है/
तुम भी जवान थीं तो,
नखरे दिखाती थी,
बोलो आज का क्या?
आज तो मुझ पर खानी है/
मस्त बहार विहँसेगी,
कली बागों में चटकेगी,
शरम आएगी भँवरों को,
कैसे कहूँगा तुमको अपना?
तुम नजरें मिलाओगी भी तो क्या?
शरमा के नजरें झुकाओगी भी तो क्या?
तुम कहना श्याम,
मैं कहूँगा रतनार,
सारी कहानी खत्म हुई,
ऐ मुरली वाले घनश्याम/
अब बारी मेरी है,
नशरमाओ
न झिझको
जरा करीब आओ,
ये घटा तो न शरमाएगी,
चाँद तो नहीं छुपेगा,
सितारा चमकता रहेगा,
भले ये रात छिप जाएगी/
तुम आज आओ तो ठीक,
नहीं तो कल न बोलूँगा,
आज जलवा दिखाओ तो ठीक,
वरना कल न निहारूँगा/
मदिरा आँखों से पिलाओ तो जानूँ,
तुम मेरी बाहों में आओ तो जानूँ,
अपने लहजे से गुनगुनाओ तो जानूँ,
शरम से पलकें झुकाओ तो जानूँ,
आज ये हिजाब हटाओ तो जानूँ/
सुबह का अफसाना कहूँगा शाम से,
शाम का कहूँगा रात से,
रात का कहूँगा सिर्फ तुमसे,
क्यूँकि तुम पहलू में होगी/
भले हकीकत में नहीं तो,
मेरे ख्वाबों में तो होगी/
सुबह की होगी फिर पुनरावृत्ति,
मैं देखूँगा आँखें मल-मल कर,
अभी तो साकी थी पहलू में,
कहाँ छुपी घटाओं में अब,
शरमाऊँगा,
तकिये में मुँह छिपाऊँगा,
क्यूँकि रात की बातें,
कहने के काबिल नहीं,
मैं शाम की मुलाकात से ही,
उत्साहित हूँ,
ठीक से मित्र-मंडली में,
बैठ कह भ सकूँगा या नहीं,
तेरी भोली चितवन ही,
आँख से आँख भिड़ाए तो अच्छा,
तुम मेरी हो जाओ तो अच्छा,
आँचल पहलू में बिखेरो तो अच्छा,
पर्दा रुख से हटाओ तो अच्छा/
ये चाँद झिलमिला जाएगा,
तेरी आँखों की नीली झील में,
दिल मचल जाएगा,
जाम उफन जाएगा,
और तुम्हारी ईद मन जाएगी//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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