तुम्हारी याद आती है/ ( कविता)
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चमन में तेज हवा जब सरसराती है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है/
तुम एक झलक अपनी दिखा कर,
गम बढ़ाने को सहराओं में भटक गईं,
मेरी आरजुएँ, मेरी तमन्नाएँ सिमटती रहीं,
मेरे अन्जाने में तुम यूँ दामन झटक गईं/
साजे- दिल पे जब कोई राजे- गम छेड़ता है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है/
सोचता हूँ तुम्हारी तस्वीर बना कर देखूँ,
शायद गमे- दिल को तस्कीन हो जाए,
विसाल की और कोई सूरत नहीं दिखती,
इसी तरह आसान शायद मुश्किल हो जाए/
जब हर आसान मुश्किल लगने लगती है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है/
मैं संगीत की सरगम से तुम्हें बुला के रहूंगा,
मैं तुम्हें सोज- ए- गमेदिल दिखा के रहूंगा,
कहीं भी रहो यहाँ चाहे वहाँ की महफिल में,
भर- भर के नाले, मैं तुम्हें रुला के रहूंगा/
जब कोई दर्द भरी दास्तान सुनाता है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है/
फलक से सितारे जमीं पर बिखरते रहेंगे,
चंदा औ' सूरज गगन में चलते रहेंगे,
सोहनी- महीवाल के फसाने रहनुमा होंगे,
हम तुम्हारी मुहब्बत में तड़पते रहेंगे/
कोई महीवाल जब सोहनी को आवाज लगाता है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है/
दामने- मुहब्बत ये तारीक न होने दूँगा,
अपने खिलाफ ये साजिश न होने दूँगा,
लाख करें यार बेवफाई मुझसे- तुमसे,
मैं जुदा अपने से अपना मीत न होने दूँगा/
कोई आशिके- बेकल जब साकी को पुकारता है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है/
बस तुम इतनी इनायत कर दो मुझ पर,
खते- इकरार तो अपना भेजो मुझ तक,
मैं तुम्हें हर डगर, हर राह में खोजता हूँ,
रुक जाओ राहों में, मेरी आवाज सुन कर/
सुनता हूँ जब लैला ने मजनूँ को खत लिखा है/
आधी रात को तब तुम्हारी याद आती है//
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तुम अपने दिल में
यही अहसास रहने दो/
मैं सिर्फ तुम्हारा हूँ
तुम्हारे सिवा किसी का नहीं/
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जो कुछ सुनाना है, सुना दे ऐ दिल!
बज्म में वो भी तो आए हुए हैं/
सुना है, दर्द का असर उनको भी है,
मगर बात वो होठों में दबाए हुए हैं//
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प्यार मेरा शरमाएगा कब तक?
हुस्न ये दामन बचाएगा कब तक?
अरे, तू इन रस्म-रिवाजों पे न जा,
कैद में पंछी तड़फड़ाएगा कब तक?
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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