इक रात खुशियों में बहक जाने दे ( गजल)
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इक बार जुल्फें अपनी सहलाने दे/
इसी बहाने जरा दिल बहल जाने दे/
कमजर्फ जमाने ने अता किए गम,
तू देकर खुशी दिल को मचल जाने दे/
अभी तूने खुद को पहचाना ही कहाँ?
गुलों पर सुबह की ओस तो पड़ जाने दे/
मुहब्बत मेरी भी रंग लाएगी यकीनन,
अपने दिल से मेरा दिल तो मिल जाने दे/
चली आओ मुकाबिल महफिल के,
छाएगा तेरा नूर, शमां तो जरा ढ़ल जाने दे/
जिसने किया तुझसे शिकवा, वो मिटा,
अपने दीवाने का भी दम जरा निकल जाने दे/
देगी जिन्दगी मेरे किवाड़ पर दस्तक,
शब को जरा और निखर जाने दे/
मुहब्बत सौंपेगी तुझे अमानतें" रतन" की,
इक रात मुझे खुशियों में बहक जाने दे/
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खुदा करे जो भी गुजरे साथ गुजरे/
मेरी महफिल में उनकी रात गुजरे//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठी गंज, इलाहाबाद/
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