अभिव्यक्ति ( कविता)
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अँधेरों के साये में,
खिलने वाले ऐ गुलाब तू,
औरों की खुशी के लिए,
जिए जा दुनिया के लिए/
तेरी अपनी कोई साधन हो,
औरों की बेवफाई की,
तुझे पहचान न हो,
दर्दे- दिल का इमकान न हो,
अपना कोई अरमान न हो/
जीवन में दर्द भी मिले हैं,
ताकि दर्द किसी का जान सको,
जो न तुम्हारे अपने हैं,
आहों पे उनकी मिटना जान सको/
जिनके लिए तुमने अपना,
खोया है सबकुछ,
वही अब छोड़ तुम्हें,
जाते हैं जाने किस नीड़ में/
उनको क्या सुनाओगे?
अपना फसाना,
जिनके लिए तुम हो,
सिर्फ एक तमाशा/
सदियों से प्यासे आए हो,
जीवन भर प्यासे रह जाओगे/
कौन है जो तुमको समझे?
किस पर तुम विश्वास करोगे?
जीना तुमको रास नहीं आता,
पीना भी तुमको नहीं भाता/
इश्क है ऐसी जोखिम,
रूठ जाता जिन्दगी का सितारा/
खो जाता है अपना चाँद कहीं,
नीख रातों की सियाही में,
और मैं ढूँढ़ा करता हूँ,
खोया है मेरा चाँद कहाँ?
जिनके लिए मैं मैंने ताना भी सहा,
खो गए हैं वो किस ओर कहाँ?
वो तो इतने बड़े हैं,
तुम छोटों के लिए उनमें दर्द कहाँ?
आज जाते हैं वो दूर कहीं,
खोज भी न पाओगे तुम उनको कहीं,
भूल जाओ पुरानी बातें,
वो तो केवल धोखा है,
कितना तो सहा है तुमने,
उनको याद करना भी बुरा है//
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तुम्हारी खातिर इक बार पहाड़ों से टकराऊँगा,
तुम्हारी खातिर समंदर की लहरें गिन बताऊँगा/
खाली सीप से तेरा दिल न बहल पाएगा,
तुम्हारी खातिर मोती समंदर से निकाल लाऊँगा/
राजीव रत्नेश
मुठ्ठी गंज, इलाहाबाद/
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