प्रतीक्षा किसकी प्रिये! ( कविता)
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खिड़की के बाहर स्थिर निगाहें तेरी आज
क्या कोई भूला-भटका राही पथ जिसका अनजान
लाली तेरे अधरों पर, छलका आज फिर से जाम
प्रतीक्षा किसकी प्रिये! पहन धानी परिधान?
बज रही आज कंगन तेरी बार- बार
कैसी यह तुम्हारे होंठों पर है कुटिल मुस्कान
तोड़ दिए स्वप्न सुनहरे, मेरे होंठों पर सजते अनजान
प्रतीक्षा किसकी प्रिये! पहन धानी परिधान?
सूनी तेरी मांग में सजी मोतियों की झालर
अधरों पे छलक रहा रस विचुम्बित जाम
सुरमई बिखरी अलकों का हुआ आज श्रिंगार
प्रतीक्षा किसकी प्रिये! पहन धानी परिधान
अलसाई कजरारे द्विगों में, ये छवि किसकी मौन
दिला रहा याद तुम्हें, डूबता सूरज जाने क्या- क्या?
विरह की घड़ियों में मेरे दिल में आन समाई क्यूँ?
प्रतीक्षा किसकी प्रिये! पहन धानी परिधान?
स्वीकृति यदि तुम्हारी होगी प्रिये! ले आऊँगा
प्रभाती शबनम भर सीपी में कर दूँगा तुझ पे कुर्बान
फिर क्यूँ इतनी बेरुखी हमसे ऐ मेरी जान!
प्रतीक्षा किसकी प्रिये! पहन धानी परिधान?
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अगर आप आएँगे ऐसे बेमौके ही/
नहीं खिला सकते गुड़ही जलेबी भी//
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अपनी खुद्दारी हम हर्गिज मिटा सकते नहीं/
सामने हज्जाम के भी सर झुका सकते नहीं//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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