मैं स्वयं तो नहीं बढ़ा था ( कविता)
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प्रेम की डगर पे मैं स्वयं तो नहीं बढ़ा था
तुमको पाने के लिए जग से नहीं लड़ा था
लाज का आँचल मुख पे डाले तुम आए
बरगद की छाँव में जब मैं खड़ा था
मैंने तुमको देखा भर उद्गार हृदय में
कोई बात नई नहीं थी तुम्हारे परिचय में
तुम सदियों के रहे, मेरे परिचित मेरे सखा
शत शत बिजलियाँ छिपी थीं नत तुम्हारे नयन में
काली तुम्हारी अलकों में थी सितारों की तड़प
कपोलों पे तुम्हारे खिल रहे थे गुलाबो- सुमन
हवाओं में फैल रही थी तुम्हारे बदन की महक
माँग में थी तुम्हारी ऊषा की लाली की चमक
तुम्हारे प्यार में क्या कुछ न मैंने सहा था
प्रेम की डगर पे मैं स्वयं तो नहीं बढ़ा था
तुम आए थे बातों में मधुरस घोले
प्रेम- प्रतिमा का दर्शन, द्वार उर का खोले
पंखुड़ियाँ खुलीं गुलाब की, हँस जब पड़े थे
मैं भी साथ हो लिया भाव हृदय में मृदुल संजोये
मौन रहा मैं, मौन रहे तुम मिलन में
दूर ही दूर रहे सदा, आते थे जब सपन में
बौर बौराई जब आम की, अमराई में
आते रहे तुम याद रह- रह कर विरह में
प्रेम का आधार पत्र वह तुमने लिखा था
प्रेम की डगर पे मैं स्वयं तो नहीं बढ़ा था
अनजाना सपना सुहाना टूट गया जाने कैसे?
तुमको पाने का अभिलाष खत्म हुआ जाने कैसे?
चंद क्षण का मेहमान, जैसे पानी का बुलबुला
गीत सुमधुर कहाँ, टूट गया जीवन तार कैसे?
मधुर रागिनी वो, अब वो मधुर संगीत कहाँ?
उर संचित धन, घायल प्यार, पूर्वापर गीत कहाँ?
विखंडित प्रेम- प्रतिमा, अब तुम्हारी प्रीत कहाँ?
खोजूँ तारों में, पूछूँ कलियों से, मेरा जीवन- मीत कहाँ?
प्रियतम थे तुम मेरे, प्रीतम तुमने कहा था
प्रेम की डगर पे मैं स्वयं तो नहीं बढ़ा था/
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वक्त पर तो तुमसे कुछ बोला न गया
प्यार का राज बाद में खोला गया
चढ़ चुके जब नीलाम पर क्या करते
जी खोल कर हमसे रोया न गया/
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प्यार पे भी मुझे तेरे ऐतबार है
दुश्मनी से भी नहीं गुरेज है
लोग कहते हैं, मेरी जान जाएगी
मैं जानता हूँ, तू बहुत दिलेर है/
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नशे में हैं सनम, हमने पिलाई तो नहीं
मंजिल खुद तलाशी होगी, हमने सुझाई तो नहीं
मयस्सर न हुआ जो बोसा- ए- गुले रुखसार
क्या कहें, हसरत दिल की हमने छुपाई तो नहीं/
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ऐ सनम भले ही तू मुझे याद न कर
भूले से भी तू किसी को बरबाद न कर
किसी की आह लग जाती किसी को
ऐ बेखबर! तू बहुत होशियार न बन//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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