Sunday, February 1, 2026

क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी? ( कविता)

क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?  ( कविता)
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दिल में बढ़ जाएगी क्या यूँ ही बेकसी?
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

मैं तो न गया था तुमसे करने इजहार
जानता था बना दोगी तुम प्यार को व्यापार
बढ़ेगी दिल में कसक, जब चलेगी बादे- सबा
तुम न निभाओगी जब करके वादा- ए- इकरार

गर्दिश में लगने लगी है अब तो ये जिन्दगी
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

फूल महकते हैं चमन में, बरसती फिजा है
आ जाओ तो बड़ी खुशनुमा ये घटा है
आग दिल की सावन से बुझती भी नहीं
तुम न आओगी तो समझो बस कजा है

किस तरह से करूँ अब बुतों की बंदगी?
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

तुम्हीं ने तो कहा था बड़ी भोली अदा से
आँखों में भर कर अश्क उसी मीठी सदा से
' अब तो चले जाना पड़ेगा, डैडी लेने आ रहे हैं,
अब मिलन होगा कैसे, बड़ी दूरी है यहाँ और वहाँ में'

सुन के दिल में हो गई बड़ी धुकधुकी
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

फिर मैंने तुमसे वहाँ का पता पूछा था
दिल में तुम्हारे क्या, तुम्हारी रजा पूछा था

मिलन की कोशिशों के बावजूद जो न मिल सके
ले फिर गुनहगारे- मुहब्बत की तुमसे सजा पूछा था

तुम बोलीं तो प्यार की बगिया महकी
तुम्हीं बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी?

तुम्हीं ने दिया था खत, तुम्हीं ने जवाब माँगा था
तुम्हीं ने दिया था दिल, तुम्हीं ने प्यार माँगा था
तुमने बुलाया था अपनी बर्थ-डे पार्टी में, देर से आया
तो तुम्हीं ने मुझसे दिन भर का हिसाब माँगा था

तुमने खफा हो के मुँह फेरा, मची खलबली
कुछ- कुछ समझ तो आया, क्या है राजे- बेरुखी

फिर क्यूँ कर के वादा फिर खत तुमने लिखा नहीं
करके प्यार तुमने कभी पैगामे- मुहब्बत भेजा नहीं
तुम क्या जानो, दिल में मेरे कसक किस बात की है बिन तुम्हारे दिल को भी तो कभी करार मिला नहीं

तुम्हारी भी बदली दुनिया, मेरी भी दुनिया बदली
तुम्हें बताओ, क्या करूँ, ओढ़ रखी है नकाबे- बेरुखी

अब आई भी पलट के दुबारा मेरे ही शहर में फिर से
दिखाने को मुझको, दुश्मनों से रिश्ता जोड़ लेती हो
खता हो मेरी माना लाख मगर, सनम तुम्हीं तो
बसा के मूरत मेरी दिल में, खुद ही तो तोड़ लेती हो

तुम कहो तो मैं भी बना के बीच बाजार फूँक दूँ तुम्हारी पुतली/
खुल के तो बताओ, क्या है तुम्हारी राजे- बेरुखी//
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मुझे आती है याद रह- रह के वो रात
कभी तेरा दिल न जलाया मैंने
सारी रात गुजारी कभी पलकों में
तो कभी ख्वाबों में तुझे बुलाया मैंने
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मिलेंगे तुझे मचलते अरमां इस दिल में/
हसरत की नजर से इक बार तो देखो/
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अब तो इक बार जरा सा बोल दो
फिर कोई खता होने से रही
लाख कसूरवार हूँ तेरा सनम
कुछ भी हो, मैं तुम्हारा दीवाना सही
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गम से घायल है मेरी मासूम तमन्ना
और मजबूरी कुछ कहने नहीं देती
तुम होते हो सामने तो ऐसा लगता है
आँखों में हों आँसू, पलक बहने नहीं देती//

               राजीव रत्नेश
          मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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