मेरे शेर पर मुँह भले मोड़ ले ( गजल)
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तेरी खामोशी मुझे आजमाएगी क्या/
लबों की फिसलन मुझे समझाएगी क्या/
मौत से भी लड़ चुका कई दफा,
जिन्दगी मुझे भरमाएगी क्या/
तेरे दीदार का मुंतजिर हूँ जरूर,
ये प्यास भला तड़पाएगी क्या/
तेरे फूल जैसे होंठ शरमाएँगे क्या,
भला तू मुझसे दामन बचाएगी क्या/
तेरी मीठी बातें दिल लुभाती हैं,
मुझसे दिल की बात छुपाएगी क्या/
उम्मीदे- सहर, शामे- अरमान होगी,
तू सितारों को भी शरमाएगी क्या/
मेरे शेर पर मुँह भले मोड़ ले" रतन"
अपने ही दिल पे, खंजर चलाएगी क्या/
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अगली- पिछली भूल कर तू आए/
आकर मेरी साँसों में बस तू जाए/
बस कुछ और न चाहिए मुझको,
आकर मेरी बज्म में जम तू जाए/
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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