शायद तुम कल आओ ( नज्म)
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रोज सबेरा,
आशा का इक नया सूरज,
उगा जाता है/
कि कल तुम नहीं आईं,
आज जरूर आओगी,
दिल को दिलासा दे जाता है/
मैं जानता हूँ,
यह सूरज भी डूब जाएगा,
पर मेरा इंतजार खत्म नहीं होगा/
कल फिर नये सूरज,
के इंतजार में,
झील किनारे बैठा रहूँगा/
कंकरियाँ फेंकता रहूंगा,
बैठा हुआ झील के किनारे,
गहरे पानी में तुम्हारा अक्स,
उभरेगा इसी झील में,
तुम पीछे से आकर,
हाथों से अपने,
मेरी आँखें मूँद लोगी/
और मेरे गले में,
बाहें डाल कर कहोगी,
' कबसे बैठे हो?
चलो घर चलो'
पर सूरज तो कब का,
ढल चुका,
पर तुम न आए/
आने वाला हर,
कल का सबेरा,
कराएगा तुम्हारा इंतजार/
जिस तरह बिछड़ी हो,
' शायद तुम कल आओ'
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