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पूछते हैं तुमसे जो दिल,
धड़कता है क्यूँ तुम्हारा बार- बार/
शरमा के पलकों की चिलमन,
गिरा घायल क्यूँ कर देते बार- बार//
जफाई तो न देखी थी, तेरी कभी,
वह हमने देखी आज/
पी लेने से मदहोश जो हूँ,
तड़पती क्यूँ बिजली सी बार- बार/
गुनाह हजारों की तू है,
बंदानवाजों का और कत्ल न कर/
साबित हो अपराध तुम्हारा,
तुम पर कोई खुदारा न हो/
चाहते नहीं कातिल करार देना,
तुम्हें, भले कत्ल हुए बैठे हैं/
जल्वागर भी तुम्हें नहीं कहना है,
भले बेहोश हुए बैठे हैं/
मयखाने में तेरे फिसलनदार,
गलीचों पे पायल की छम-छम/
बिन पिए हो जाते हैं मदहोश,
दीवाने सुन कंगन की खनखन/
तीर नजरों का चलता है कैसे?
तेरी आँखों में भरे अफसाने/
हस्ती की इन राहों में अलगाव,
अखरता है तेरा अपने को//
राजीव रत्नेश
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