Wednesday, February 11, 2026

मैं सोचता हूँ तुमसे ( कविता)

मैं सोचता हूँ तुमसे  ( कविता)
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मैं सोचता हूँ तुमसे दूर चला जाऊँ/
जो थोड़ी नजदीकी है उसे मिटा जाऊँ/
तुमसे कोई वफा की उम्मीद न रही,
सोचता हूँ तुम्हारे खत जला जाऊँ/

आग जो लगी है बुझती नहीं दिखती,
तुम कोई खास सस्ती नहीं दिखती/
तुम बड़ी लोग हो अपने से पटेगी नहीं,
वैसे भी तुम्हारे शबाब में मस्ती नहीं दिखती/

मैं सोचता हूँ ये निशाने- वफा मिटा जाऊँ/
मैं सोचता हूँ तुमसे दूर चला जाऊँ/

कल तुमसे मिलने की सोच रहा था,
तुम्हारे यहाँ जाने का बहाना खोज रहा था/
तुमने भी न निकाली कोई तरकीब,
मैं सारी रात तुम्हारे प्यार को कोस रहा था/

सोचता हूँ दिल से तुम्हारा अक्स मिटा जाऊँ/
मैं सोचता हूँ तुमसे दूर चला जाऊँ/

तुम कल की परवाह में ही,
इस हसीं आज को गँवा देती हो/
कल निकलेगी लाटरी ये सोच कर,
आज की तनख्वाह गँवा देती हो/

सोचता हूँ ये तनख्वाह लेकर चला जाऊँ/
मैं सोचता हूँ तुमसे दूर चला जाऊँ/

कल तुम आईं नहीं मौसम सुहाना था,
रंगीं थी महफिल मंजर मस्ताना था/
तुम्हारे बिना भी हो गई गुलजार शाम,
कल नशे में तेरा हर दीवाना था/

सोचता हूँ ये नशा मिटा कर चला जाऊँ/
मैं सोचता हूँ तुमसे दूर चला जाऊ/
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बहुत बेआबरू हो गए हैं 
                   तुमसे नजर मिला के/
इक बार तो देखले कातिल!
                     जरा सा मुस्करा के//

               राजीव रत्नेश
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