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खे रहा हूँ नाव भगवन!
तुम्हारी पूजा के पतवार से/
बढ़ रहा इसी आस में,
बचा लोगे मुझे मँझधार से/
मैं तुम्हारे ही सहारे,
चल पड़ा हूँ, तूफान में भी/
लड़ रहा बल पा तुम्हीं से,
इस भयानक धार से/
देखता हूँ स्वर्ग- सुन्दर,
नत नयनों में तुम्हारे/
नाता नहीं अब कोई मुझे,
अब इस संसार से/
जी रहा हूँ क्यूँकि,
मुझको जीवन तुमने दे दिया/
तुम ही कर अब मुक्त सकते,
जिन्दगी के इस भार से//
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राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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