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तुम्हारी सहेलियों में,
चर्चा आम है/
कि तुमने मुझे बोर किया,
अपने इन्हीं गोरे हाथों में,
लेकर औरत का हथियार,
मुझपे वार किया/
मदहोश मुझको किया,
दिखाने को उनको,
तुमने समेटी थी,
निगाहों में हया/
बिखेरी थी अधरों पे,
मृदु मुस्कान,
और बड़े धीरे से,
नश्तर बातों का लगाया था/
पर दिल में तुम्हारे था क्या?
मेरे सिवा न जान सका कोई/
मेरी दुनिया लुटी,
बनी रुसवाई अभिशाप,
नक्शा- ए- जेहन पे तुम्हारे,
उभरती रही तस्वीरे- गैर कोई/
मैंने भी तो किया था,
तुमको बोर/
मेरे दोस्तों में,
चर्चा आम है,
उसी की कसर,
निकाली थी,
तुमने शायद/
और उसी का ये अंजाम है,
कि तुमने मुझे बोर किया,
मन- मानस के तंतुओं को,
यूँ झकझोर दिया/
कारण साफ है,
जो कुछ था भंगिमा में,
तुम्हारे/
वो कौन जानता है?
सिवा मेरे- तुम्हारे/
फिर भी------
तुम्हारी सहेलियों में चर्चा आम है,
कि तुमने मुझे बोर किया/
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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