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हुस्न जब बेनकाब होता है,
हजारों का हिसाब होता है/
जिनकी नीयत खराब होती है,
उनका खाना खराब होता है//
हमारी सरगोशी
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(१) कितना पाक था प्यार,
सनम हमारे- तुम्हारे दरम्यान,
सुरूर में न आए पीकर,
बोतल पे बोतल शराब/
जब तुम जवां थी, तब तो
नहीं हुई हमारी नीयत खराब,
आज ढ़लती जवानी में तुम्हारी,
क्यूँ होगी हमारी नीयत खराब//
(२) सुनना जरा गौर से ऐ शाहजादी- ए- महफिल,
तुम्हारे वार से जाने कितनों का कलेजा चाक होता है/
तुम अपनी वफा छोड़ कर, दुश्मनी पे उतर आती हो,
जब तुम्हारी चलती नहीं, और दिमाग खराब होता है//
(३) अजी! मल्क- ए- तरन्नुम का कहना है,
कि हमारी नीयत ही खराब है/
हम कहते हैं, कैसे कायम रहे नीयत हमारी,
जबकि आँखों से उन्होंने पिलाई शराब है//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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