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जाती नहीं ये दिल की तड़प तुम बिन/
चलो ओढ़ के सो जाएँ अब तो कफन/
चाँद-सितारे चमकते हैं गगन में,
जलते हैं दो बदन प्यार की अगन में/
सय्याद के आने की खबर हो लाख,
मगर खिलते हैं गुल फिर भी चमन में/
मिटती नहीं किसी तरह रूह की थकन,
चलो ओढ़ के सो जाएँ अब तो कफन/
न होंगे जुदा, जमाना बने दीवार भले,
दुश्मन बने जगत- व्यवहार भले/
मेरी तू, मैं तेरा, ये बंधन न टूटेगा,
मजबूर हो जाए हमारा प्यार भले/
बढ़ गई है अब तो दिल की तपन,
चलो ओढ़ के सो जाएँ अब तो कफन/
तुम दूर से पास आई हो तो क्या?
दूरी- ए- दिल मिटा, फासला सिमट तो क्या?
रोक तुम पे पहले से ज्यादा लगी है,
भले तुम मेरे और करीब आई हो तो क्या?
ये नजदीकी बनी है और भी जलन का सबब,
चलो ओढ़ के सो जाएँ अब तो कफन/
बजती है तुम्हारी पायल अबभी,
सजती है यादों की बारात अबभी/
तुम हँसती हो तो लबों से फूल झड़ते हैं,
अँधेरों में बिजली चमकती है अबभी/
अब तो बनी जाती है दुश्मन ये पवन,
चलो ओढ के सो जाएँ अब तो कफन/
शबनमी अश्क हैं, तुम्हारी सोने की काया,
क्या कहूँ, समझ न पाया तुम्हारी माया/
कभी तो कौंधती हो सावन की बिजली सी,
कभी हो जाती है धूप तो कभी छाया/
आग लगाने लगी है दिल में तुम्हारी लाल रिबन,
चलो ओढ़ के सो जाएँ अब तो हम तुम कफन//.
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पिलाने को कोई साकी न रही,
हम पे कोई रात अब भारी न रही/
निकल जाते हैं, हम तो उस राह पर,
जिधर कोई आवाजाही भी न रही//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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