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दो दिन हँसा के प्यार में ये तुमने क्या किया?
मांगी थी चन्द खुशियाँ, तुमने क्यूँ रुला दिया?
चुभने लगी पलक में अब तो चंदा की रोशनी,
तड़पती रही तुम्हारी कैद मासूम ये जिन्दगी/
खिलने के पहले किसने गुल को सजा दिया?
दो दिन हँसा के प्यार में ये तुमने क्या किया?
लुट गया इक शायर की सुरमई यादों का जहां
जिन्दगी के अँधेरों में खो गई तुम किस ओर कहाँ?
मांगा था मैंने क्या और मुझको ये तुमने क्या दिया?
दो दिन हँसा के प्यार में ये तुमने क्या किया?
उम्मीद थी, इसीलिए तुमसे धोखे का कोई गिला नहीं किया
किस्मत के भरोसे जो बैठा, उसको कुछ भी नहीं मिला/
जाने क्यूँ तुमने जाम में ये जहर क्यूँ मिला दिया?
दो दिन हँसा के प्यार में ये तुमने क्या किया?
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद
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