Wednesday, February 11, 2026

मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ ( कविता)

मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ  ( कविता)
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मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ,
जिससे खुद पर हँसी आए/
दुनिया खुद भी हँसे-------
औरों को भी हँसाए/

मैं कुछ ऐसा कहना चाहता हूँ,
जो सबको अतिश्योक्त लगे,
मगर हकीकत भी हो/
वास्तविकता के दायरे में न समाए,
मगर बात अवास्तविक भी न हो/

इसलिए सोचता हूँ-----
तुमसे प्यार करूँ-------
तुम्हारी अदाओं का जवाब दूँ,
तुम्हारी रुनझुनाती पायल पर,
एक गीत की रचना करूँ/

अकेले में फिर बैठकर,
तुम्हारी एक तस्वीर बनाऊँ,
तुम्हारे बाँए गाल पर के,
काले तिल को लेकर,
अफसाने का एक पहाड़ बनाऊँ/

तुम्हारी काली चोटी की उपमा दूँ,
काली सर्पिणी से,
तुम्हारी आँखों की उपमा दूँ,
नीली झील की गहराई से
होठों को कहूँ पंखुड़ियाँ गुलाब की/
सोचता हूँ कमर को कमान कहूँ,
क्योंकि--------

मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ,
जिससे खुद पर हँसी आए/

तुम्हारे करीब आने की कोशिशों पर,
अब सोचता हूँ ध्यान दूँ,
तुम्हारी बातों में गूढ़ रहस्य खोजूँ/
और फिर जब बैठी हो महफ़िल,
जाम पर जाम पीने वालों की,
हो रही हों बातें, छन रही हों गप्पे,
मैं तुम्हारी आँखों से थोड़ी पी के जाऊँ,
फिर मैं भी हाँकू------

मेरा प्यार तो ताजमहल है,
मेरा प्यार तो शीशमहल है,
हीर तुम हो राँझा मैं हूँ,
लैला तुम हो मजनूँ मैं हूँ,
और कोई मिसाल ऐसी,
तुम कायम कर नहीं सकते,
जो मैं कर सकता हूँ,
तुम्हें अपनी बना कर,
क्यूँकि------
मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूँ,
जिससे खुद पर हँसी आए//

        अगर कोई मुफलिस,
                  तामीर न करवा सके ताजमहल/
          इसका ये तो मतलब नहीं,
                   कि उसकी कोई मुमताज नहीं//

               राजीव रत्नेश
        ट्विन टावर, ग्रेटर नोयडा
                 दिल्ली
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