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ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/
तुम्हें मालूम नहीं है दस्तूरे- मुहब्बत,
न तुम मेरे दिल को आज भरमाओ/
ये जो सैकड़ों मुहब्बत की दास्तानें हैं,
हीर-राँझा, सोहनी- महीवाल के फसाने हैं/
उनकी बाबत तुम्हें कुछ भी मालूम नहीं,
उनको गुजरे हुए बीत गए जमाने हैं/
हमारी मुहब्बत बिल्कुल रुहानी है,
इसे जिस्मानी का सामां न बनाओ/
ऐ सनम तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/
जिन्दादिली की बातें भी बहुत सुनी हैं,
लोगों की सीख भी हमने बहुत गुनी है/
अपना सभी कुछ खो के हमने ये पाया,
एक मुहब्बत ही हर चीज से बड़ी है/
हाले- जिगर कुछ दूँ भी ठीक नहीं है,
न मुझे तुम अब और तड़पाओ/
ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ/
हम प्यार में तूफां से टकरा सकते थे,
बेगाने तो क्या अपनों से टकरा सकते थे/
काश! तुमने साथ दे के देखा होता,
हम हर हाल में तुम्हें अपनी बना सकते थे/
अब तो बिगड़ गईं हैं बातें भी सारी,
न तुम मुझे गुजरा जमाना याद दिलाओ/
ऐ सनम! तुमसे है गुजारिश मेरी,
मेरे तसब्बुर में भी न तुम आओ//
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जितने तुम दूर होते गए, दर्द बे दस्तो- पा होता गया,
ऐ बेदर्द सुन- समझ, मैं परायों से बावस्ता होता गया/
आहिस्ता कदमों से चलो, चमन के गुल जाग जाएँगे,
दिन पर दिन इश्क मेरा, दूसरों को रास्ता देता गया//
राजीव रत्नेश
मुठ्ठीगंज, इलाहाबाद/
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