चार-चाँद लगा दिए मेरे अशआर ने/
छुपते-छुपते भी कहाँ तक छिपोगे,
निशानी दी है तेरे खदो- खाल ने/
दीवानगी यूँ भी परवान पर थी,
जल्वा बिखेरा और भी शराब ने/
मेरी वफा को पसंद न थी हिकमत,
बज्म में आग लगाई खाला- ए- शैतान ने/
गिरह पर गिरह पड़ गई डोर में,
कितना चाहा, चढ़ा दें पतंग आस्मान में/
उड़ना चाहा आकाश में पंछ ने ऊँचा,
कतर डाले किसी ने पर परबाज के/
आँधी-तूफान भी न डिगा सके मुझको,
काम कर दिखाया आँसुओं के धार ने/
फसील ऊँची न थी तेरी, मेरी फसील से,
झमेला करवाया सिर्फ एक ऊँची नाक ने/
समझने वाले समझते थे हकीकत' रतन'
अफसाने कह रहे हैं, मुहब्बत की किताब के//
राजीव रत्नेश
**************

No comments:
Post a Comment