Saturday, February 28, 2026

समझने वाले समझते थे हकीकत( गजल)

हुस्नो- जमाल ऐसे भी कम नथा,
चार-चाँद लगा दिए मेरे अशआर ने/

छुपते-छुपते भी कहाँ तक छिपोगे,
निशानी दी है तेरे खदो- खाल ने/

दीवानगी यूँ भी परवान पर थी,
जल्वा बिखेरा और भी शराब ने/

मेरी वफा को पसंद न थी हिकमत,
बज्म में आग लगाई खाला- ए- शैतान ने/

गिरह पर गिरह पड़ गई डोर में,
कितना चाहा, चढ़ा दें पतंग आस्मान में/

उड़ना चाहा आकाश में पंछ ने ऊँचा,
कतर डाले किसी ने पर परबाज के/

आँधी-तूफान भी न डिगा सके मुझको,
काम कर दिखाया आँसुओं के धार ने/

फसील ऊँची न थी तेरी, मेरी फसील से,
झमेला करवाया सिर्फ एक ऊँची नाक ने/

समझने वाले समझते थे हकीकत' रतन'
अफसाने कह रहे हैं, मुहब्बत की किताब के//

             राजीव रत्नेश
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