तो राहों में न कोई सायबां मिला/
जहां कहीं तफ्तीश की, न मिला,
जो मिला भी सामां, रायगां निकला/
अपना शहर छोड़ते वक्त अहाते में,
एक पेड़ अपने हाथों लगा आया था,
ट्रेन से लौटा जो तेरे शहर से,
वही शजर अपना पहचाना निकला/
कद्र की होती जो तूने मोहब्बत की,
अजनबी शहर जान मैंने छोड़ा न होता,
तू अपने हाल में मस्त, सफर से मैं मस्त,
सूटकेस से मेरे डायरी के सिवा न सामां निकल
मकतबे- इश्क नसों में खूं बन कर,
दौड़ता फिरता था मेरे,
डर गई तू, साथ मेरा छोड़ा तुमने,
तेरी मर्तबा आज तेरा अफसाना निकला/
तुझे चाहा, छक के पिया, लबों के प्याले से,
वहम- वहम में तुझे क्या न बनाया मैंने,
जो कुछ भी लिखा आज तक,
लबों से बह कर वो तेरा नगमा निकला/
आजमाने को तुझे तेरा दिल लिया भी,
अपना दिल तुझे दिया भी,
मेरे अफसाने में मिलन नहीं लिखा,
जो हुआ भी, वो मोहब्बत का शोरबा निकला/
मोहब्बत में जिल्लत उठाना क्या,
जरूरी था, दस्तूरे- महफिल था तेरा,
हम तो इंकलाब के लिए निकले थे,
बज्म में शोर कैसा बरपा निकला/
मदहोश होने को ही हम तेरी,
महफिल में बरहना- पा चले आए,
पता था सागर था पहले से खाली,
खाली तेरा अब तो पैमाना निकला/
दावते- जश्न दिया जाता है करीने से,
लुभा के बुलाया जाता है सलीके से,
पिला-पिला के किया जाता है मदहोश,
तेरी महफिल का ये उसूल पुराना निकला/
पीकर शैम्पेन तेरी निगाहों का,
गिरते-गिरते भी हम संभल गए,
तेरे पीछे जो हम निकले,
तो साथ मेरे सारा जमाना निकला/
बारीकियाँ मोहब्बत की गर समझ लेतीं,
गैरों के दर पे यूँ न मैं पशेमां होता,
कर दिया पहले तो तेगे- निगह से कत्ल,
फिर शान से' रतन' का जनाजा निकला//
राजीव रत्नेश
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