Saturday, February 28, 2026

फिर शान से जनाजा निकला ( गजल)

तेरी जुल्फों की जद से निकला,
      तो राहों में न कोई सायबां मिला/
जहां कहीं तफ्तीश की, न मिला,
      जो मिला भी सामां, रायगां निकला/

अपना शहर छोड़ते वक्त अहाते में,
     एक पेड़ अपने हाथों लगा आया था,
ट्रेन से लौटा जो तेरे शहर से,
      वही शजर अपना पहचाना निकला/

कद्र की होती जो तूने मोहब्बत की,
      अजनबी शहर जान मैंने छोड़ा न होता,
तू अपने हाल में मस्त, सफर से मैं मस्त,
       सूटकेस से मेरे डायरी के सिवा न सामां निकल

मकतबे- इश्क नसों में खूं बन कर,
       दौड़ता फिरता था मेरे,
डर गई तू, साथ मेरा छोड़ा तुमने,
       तेरी मर्तबा आज तेरा अफसाना निकला/

तुझे चाहा, छक के पिया, लबों के प्याले से,
        वहम- वहम में तुझे क्या न बनाया मैंने,
जो कुछ भी लिखा आज तक,
        लबों से बह कर वो तेरा नगमा निकला/

आजमाने को तुझे तेरा दिल लिया भी,
         अपना दिल तुझे दिया भी,
मेरे अफसाने में मिलन नहीं लिखा,
         जो हुआ भी, वो मोहब्बत का शोरबा निकला/

मोहब्बत में जिल्लत उठाना क्या,
          जरूरी था, दस्तूरे- महफिल था तेरा,
हम तो इंकलाब के लिए निकले थे,
          बज्म में शोर कैसा बरपा निकला/

मदहोश होने को ही हम तेरी,
           महफिल में बरहना- पा चले आए,
पता था सागर था पहले से खाली,
           खाली तेरा अब तो पैमाना निकला/

दावते- जश्न दिया जाता है करीने से,
           लुभा के बुलाया जाता है सलीके से,
पिला-पिला के किया जाता है मदहोश,
           तेरी महफिल का ये उसूल पुराना निकला/

पीकर शैम्पेन तेरी निगाहों का,
            गिरते-गिरते भी हम संभल गए,
तेरे पीछे जो हम निकले,
            तो साथ मेरे सारा जमाना निकला/

बारीकियाँ मोहब्बत की गर समझ लेतीं,
             गैरों के दर पे यूँ न मैं पशेमां होता,
कर दिया पहले तो तेगे- निगह से कत्ल,
             फिर शान से' रतन' का जनाजा निकला//

             राजीव रत्नेश
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