कुछ ख्याल न किया मेरे आजाद- ख्यालात का/
गर्दिशों में लाकर ऐसा, ऐ जमाने! तूने छोड़ा,
किसी ने पूछा नहीं, दिया जवाब नहीं मेरे सवालात का/
आँखों में पहले से लाल डोरे, थे, अब और सुर्ख हो गई,
इन्हें मौका भी न मिल सका, मौसमी बरसात का/
तूने भी न समझा, तेरी बहन ने भी तो न समझा,
वास्ता देता रहा सबको अपने तजरबाते- हयात का/
तेरी अम्मा मेरे लिए तुमसे क्या कह के गुजर गई,
तुझे एहतियात भी न था, रास्ता न बदला बर्ताव का/
तेरी बिटिया से ही दिल मेरा भी कहाँ भिड़ गया,
इशारा उसे पहले ही दे दिया, जिंदगी के झंझावात का/
खुद हेड खाया और लेग पीस मुझे खिलाया,
ले आया था मुर्गा ईदगाह से हलाल का/
तू स्टेशन से लौट आया खाली हाथों, मगर क्या करता,
सुलझाता फिरा झगड़ा औरों के मकान का/
बार- बार भगाया, घर से निकाला डंडा मार कर,
जाने कैसा खौफ था, मेरे कुत्ते सुल्तान का/
मेजबानी करता था अपने रिश्तेदारों की ऐसी,
खो गया रजिस्टर तेरा हिसाबो- किताब का/
हुआ कुछ इस तरह खफा, भूला सारा रिश्ता,
बेटी ब्याह दिया, रास्ता देखा था हरिद्वार का/
तेरे शहर- मकानात छोड़ मुझे तो इक दिन जाना ही था,
रंगे- गुलगूं में जी लग गया मेरे, दिल्ली- दरबार का/
अपनी लंगोटी छोड़ लिया रास्ता तुर्किस्तान का,
कपड़े मँगवाए तूने कारखाना- ए- महाराष्ट्र का/
गैर तुझे क्या पूछते, तूने अपनों को जब न समझा,
हाले- पुरशिस को हम आए, फीस भरा डाक्टरी- इलाज का/
एक बार अपनी पैदा- फजीहत से ही पूछ लिया होता,
बेजा बदनामी न होता सीधे उसकी बारात का/
जमाने का गिला तुमको बहुत था, शिकवा था मुझसे,
तफसील से देखूँ तो, बुरा न माना तेरे दिए सदमात का/
हरकतें मेरी जा-बजा, उसको कैसे नागवार गुजरीं,
लबो- रुखसार खुद बढ़ा देती थी, बुरा न लगा चूम-चाट का/
रहनुमाई में तेरी, तेरे घर पे कई- कई बार शहनाइयाँ बजीं,
बुलाया भी नहीं, कार्ड भी दिया नहीं, हक मार दिया दामाद का/
गुजरा जमाना अब कौन याद दिलाए, खुद समझ- बूझ,
बोहन- बट्टा भी हुआ नहीं, घपले में हिसाब तेरे कारोबार का/
तुझसे तो सीधे मुँह बात भी न करना चाहे' रतन',
बात बड़ी न थी, कौलो- करार था सिर्फ चार- हजार का/
राजीव रत्नेश
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