लगता उल्फत की बातों से अंजान है वो/
कितना ही बचें, शौक- ए- मोहब्बत रखते हैं,
आजकल मुझ पर बहुत मेहरबान है वो/
नजदीकियों में भी नजर से काम लेते हैं,
मुझे लगता, खाला- ए- शैतान है वो/
शिकव- ए- मोहब्बत तो बस बहाना है,
पास आने को मेरे बस अरमान है वो/
सुना है दिल के हाथों मजबूर हैं वो भी,
फिजाओं में चमने- इश्क गुल्जार है वो/
दिलनशीं वादियों में गुले- अनार है वो,
विसाल का मेरा खुल्लम खुल्ला इंतजार है वो/
राहे- वफा का मैं तो अदना मुसाफिर हूँ,
मेरे सफर की मंजिल, मेरा मुकाम है वो/
रोजो- रोज करती हुस्न का फसूं जिन्दाबाद,
मेरे गुलो- गुलिस्तां का तिफ्ले- दरबान है वो/
क्या मुझे चाहिए, समझता है ठीक से वही,
मेरे सफर का मुकम्मल इंतजाम है वो/
मेरी रगों में लहू का संचार है वो' रतन'
उसकी परस्तिश, खुदा का फरमान है वो//
राजीव रत्नेश
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