बैठा हूँ इंतजार में, पहले मोड़ की अमराई में/
चुभन दिल में होती है, बड़ी गहराई से,
हम भुला न पाए तुमको समझदारी से/
सरफरोशी की तमन्ना दिल में हमारे है,
आजा सू- ए- मकतल तू चतुराई से/
उमंगों से नहीं उछलता अब दिल,
नहीं बजती दिल में खुशी की शहनाई है/
दिल तप कर हो गया है रेगिस्तान,
अब तो आओ सजी धजी चूनर धानी में/.
किधर गए सपने, मंजिल से कहीं दूर,
आती हो याद, साथ हर जम्हाई के/
इश्क का बुखार तेरा दो रोज में उतर गया,
न ढूँढेंगे तुझे अब तेरी गुमशुदगी में/
यही तो कमी है कि तेरे पास दिल नहीं है,
जो था भी लगाया किसी तीरंदाज शिकारी से/
तुमसे बढ़कर एक से एक हैं तेरे मुहल्ले में,
तुम सा जिद्दी न देखा कभी जिन्दगी में/.
पीछे ही हटना था जो चार कदम' रतन',
बढ़ना नथा तुझे दो कदम आशिकी में//
राजीव रत्नेश
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