Saturday, February 28, 2026

पीछे ही हटना था जो( गजल)

खूब तड़पे, चोट खा ली तनहाई में/
बैठा हूँ इंतजार में, पहले मोड़ की अमराई में/

चुभन दिल में होती है, बड़ी गहराई से,
हम भुला न पाए तुमको समझदारी से/

सरफरोशी की तमन्ना दिल में हमारे है,
आजा सू- ए- मकतल तू चतुराई से/

उमंगों से नहीं उछलता अब दिल,
नहीं बजती दिल में खुशी की शहनाई है/

दिल तप कर हो गया है रेगिस्तान,
अब तो आओ सजी धजी चूनर धानी में/.

किधर गए सपने, मंजिल से कहीं दूर,
आती हो याद, साथ हर जम्हाई के/

इश्क का बुखार तेरा दो रोज में उतर गया,
न ढूँढेंगे तुझे अब तेरी गुमशुदगी में/

यही तो कमी है कि तेरे पास दिल नहीं है,
जो था भी लगाया किसी तीरंदाज शिकारी से/

तुमसे बढ़कर एक से एक हैं तेरे मुहल्ले में,
तुम सा जिद्दी न देखा कभी जिन्दगी में/.

पीछे ही हटना था जो चार कदम' रतन',
बढ़ना नथा तुझे दो कदम आशिकी में//

             राजीव रत्नेश
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