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चांद-सितारों की सदा बात करते, सैर करते थे परिस्तान की,
जाने कहाँ गए वो अहबाब, बन गए थे जो दुश्मन मेरी जान के/
जमीं पर पाँव न पड़ते थे, आस्मानों में उनका ठिकाना था,
आधे से ज्यादा उनमें शामिल थे लोग मेरी ससुराल के/
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सोचा न था कि वो नाक भी छिनकते होंगे,
बस हम उनकी तरहदार नाक ही देखते रह गए/
जहाँ-जहाँ नाक छिनकी उन्होंने अपनी अदा से,
वहाँ-वहाँ खुद- ब- खुद तरह- तरह के फूल खिल गए//
राजीव रत्नेश
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